होम / छत्तीसगढ / वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके की पुण्यतिथि पर भिलाई स्टील प्लांट शेड्यूल्ड ट्राइब एम्पलाईज वेलफेयर एसोसिएशन ने किया भावपूर्ण श्रद्धांजलि व नमन।
छत्तीसगढ
स्वतंत्रता संग्राम के अमर वीर योद्धा, गोंडवाना के शेर वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके की पुण्यतिथि पर दिनांक 21.10.2025 को भिलाई स्टील प्लांट शेड्यूल्ड ट्राइब एम्पलाईज वेलफेयर एसोसिएशन (Bhilai Steel Plant Scheduled Tribe Employees Welfare Association) ने हृदयस्पर्शी श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया। 1857 की क्रांति के इस पराक्रमी सेनानी को नमन करते हुए एसोसिएशन के सदस्यों ने उनके बलिदान की गाथा को स्मरण किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता और शुभारंभ किरण बास्की के द्वारा की गई। सदस्यों के द्वारा वीर बाबूराव की तस्वीर पर फूल माल्यार्पण किया गया। इसके बाद उपस्थित सदस्यों ने सामूहिक रूप से 'वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके अमर रहें' का उद्घोष किया।
अध्यक्ष प्रदीप टोप्पो के द्वारा वीर बाबुराव पुलेश्वर शेडमाके की पुण्यतिथि के अवसर पर उनके जीवनी और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया उन्होंने बताया कि 21 अक्टूबर का दिन – वह अमर तिथि है जब गोंडवाना की धरती का एक सच्चा सपूत, वीर बाबुराव पुलेश्वर शेडमाके ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 1858 में चंद्रपुर के खुले मैदान में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कुचक्र के आगे अडिग खड़े होकर उन्होंने फांसी का कष्ट सहा, लेकिन अपनी मातृभूमि के स्वाभिमान को कभी नहीं झुकने दिया। यह दिन केवल शोक का नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत है – जहां साहस की ज्वाला आज भी जल रही है।
एक आदिवासी नायक की अमर कहानी वीर बाबुराव पुलेश्वर शेडमाके का जन्म 12 मार्च 1833 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के अहेरी तहसील के किश्तपुर गांव में हुआ था। बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ चंदा (वर्तमान चंद्रपुर) क्षेत्र में 'जंगोम दल' का गठन कर 400-500 आदिवासी और रोहिल्लाओं को संगठित किया। मार्च 1858 में उन्होंने राजगढ़ परगना पर कब्जा कर क्रांति की लौ प्रज्ज्वलित की। गोरिल्ला युद्धनीति से ब्रिटिश सेना को तीन बार करारी शिकस्त देने वाले इस वीर को 18 सितंबर 1858 को गिरफ्तार किया गया और 21 अक्टूबर 1858 को चंदा जेल के मैदान में फाँसी दे दी गई। उनकी अंतिम वाणी थी, "मैं कभी झुकूँगा नहीं, मातृभूमि के लिए जीऊँगा और मरूँगा!"
"वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके आदिवासी समाज के गौरव हैं। उनके बलिदान से प्रेरित होकर भी हमारा एसोसिएशन अनुसूचित जनजाति कर्मचारियों के कल्याण के लिए निरंतर प्रयासरत है। यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है।"
वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके की पुण्यतिथि हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की कीमत अनमोल है। उनके बलिदान को नमन करते हुए, हमें संकल्प लेने की आवश्यकता है कि उनकी गाथा को जीवित रखेंगे और आदिवासी समाज के गौरव को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँगे।"
"बाबूराव हमें सिखाते हैं कि स्वतंत्रता और सम्मान के लिए हर लड़ाई मायने रखती है। हमें उनकी गाथा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना होगा।"
संदेश
बाबुराव पुलेश्वर शेडमाके केवल एक योद्धा नहीं, आदिवासी अस्मिता के प्रतीक थे। उन्होंने सिद्ध किया कि जंगल की गोद में पलने वाले गोंड पुत्र भी साम्राज्यवाद के सामने अटल दीवार बन सकते हैं। आज, जब आदिवासी अधिकारों पर संकट मंडरा रहा है – भूमि, वन और संस्कृति की रक्षा का प्रश्न जीवंत है – उनकी शहादत हमें याद दिलाती है: "स्वाभिमान से बढ़कर कोई बलिदान नहीं।" उनकी कहानी इतिहास की किताबों से बाहर निकलकर हमारे खून में दौड़ती है।
आज इस श्रद्धांजली कार्यक्रम में, हम उनके चित्र पर माल्यार्पण करें, उनके गीत गाएं और उनके संघर्ष को सलाम करें। आइए, संकल्प लें कि उनकी तरह हम भी अपनी धरती, अपनी संस्कृति और अपने हक की रक्षा करेंगे। ताकि वीर बाबुराव पुलेश्वर शेडमाके के सपने साकार हों सके!
साथ ही उन्होंने कहा कि वीर बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके की पुण्यतिथि को प्रतिवर्ष बड़े उत्साह से मनाया जाए तथा अपने घर-परिवार, समाज में वीर गाथाओं को बताया जाए। स्कूल-कॉलेजों में उनकी वीर गाथा को पाठ्यक्रम में शामिल कराये जाने की मांग की पहल किये जाने का भी विचार दिया । यह आयोजन न केवल श्रद्धांजलि का माध्यम बना, बल्कि आदिवासी इतिहास के संरक्षण का संदेश भी दे गया।
कार्यक्रम में एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप टोप्पो, महासचिव श्याम सुंदर मुर्मू, उपाध्यक्ष(प्रथम) बी.बी. सिंह, संयुक्त महासचिव(प्रथम) ललित कुमार बघेल, संगठन सचिव घनश्याम सिंह सिदार, संयुक्त संगठन सचिव कृष्ण कुमार मुर्मू, जोनल सचिव किरण बास्की, कार्यकारिणी सदस्य राम सिंह मरकाम, सदस्यगण - पी. एस. सिदार, लेखराम रावटे, बलराम सिंह ठाकुर अन्य उपस्थित रहे।
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